अब न होगी कैदियों की रिहाई में देरी
अनूप भटनागर-
हमारा संविधान प्रत्येक नागरिक को प्राण और दैहिक स्वतंत्रता का अधिकार प्रदान करता है लेकिन इस मौलिक अधिकार के हनन की खबरें अक्सर सामने आती रहती हैं। इनमें सबसे ज्यादा घटनाएं नागरिकों को अवैध तरीके से हिरासत में रखने या फिर अदालत के आदेश के बावजूद कई-कई दिनों तक उन्हें जेल से रिहा नहीं करने से संबंधित होती हैं। देश की सर्वोच्च अदालत एक ऐसी व्यवस्था शुरू कर रही है, जिसमें क्योंकि जल्द ही ‘कागो हाथ संदेशा भेजनेÓ की पुरानी परंपरा बीते दिनों की बात हो जायेगी और कैदियों की रिहाई में विलंब नहीं होगा।
अदालत से जमानत प्राप्त करने या रिहाई का आदेश हासिल करने वाले व्यक्ति के लिए न्यायिक आदेश के बावजूद कुछ घंटे या दिन जेल की सलाखों के पीछे गुजारना मुश्किल होता है। ऐसे कैदियों की स्थिति पिंजरे में बंद उन पक्षियों जैसी होती है जो पंख फडफ़ड़ा सकते हैं लेकिन उड़ नहीं सकते। अदालत का प्रमाणित आदेश समय से नहीं मिलने के आधार पर रिहाई में विलंब की स्थिति को उच्चतम न्यायालय ने बहुत ही गंभीरता से लिया है। न्यायालय को लगता है कि आधुनिक संचार युग में भी हम आदेश (न्यायिक) पहुंचाने के लिए आकाश में कबूतर उड़ाना चाहते हैं। उच्चतम न्यायालय ने बहुत ही महत्वपूर्ण कदम उठाया है, जिसके तहत न्यायिक आदेश को तुरंत और सुरक्षित तरीके से डिजिटल संप्रेषण प्रणाली के माध्यम से जेलों तक पहुंचाया जायेगा। उम्मीद है कि नयी व्यवस्था एक महीने के आसपास प्रभावी हो जायेगी।
शीर्ष अदालत ने हाल ही में न्यायिक आदेश के बावजूद आगरा की जेल में बंद 13 कैदियों की आठ दिन तक रिहाई नहीं होने की घटना का स्वत: संज्ञान लिया था। इस घटना के बाद ही न्यायालय ने कैदियों की रिहाई के लिये न्यायिक आदेश पहुंचाने की इस पुरानी व्यवस्था को बदलने तथा डिजिटल माध्यम से आदेश संप्रेषित करने की दिशा में यह कदम उठाया है। न्यायालय ने जेल में बंद कैदियों की वैयक्तिक स्वतंत्रता के अधिकार की रक्षा करते हुए अब न्यायिक आदेश की प्रमाणित प्रति दस्ती तरीके से भेजने की बजाय जमानत संबंधी आदेश डिजिटल तरीके से संप्रेषित करने का निर्णय किया है। अब जेल अधिकारियों के लिये अदालत के आदेश की प्रमाणित प्रति नहीं मिलने या ऐसे ही किसी अन्य बहाने से जमानत पाने वाले व्यक्ति की रिहाई में विलंब करने की गुंजाइश नहीं रह जाएगी।
इस नई व्यवस्था से देश के दूरदराज इलाकों की जेलों में बंद कैदी भी लाभान्वित होंगे जिन्हें जेल प्रशासन आदेश की दस्ती प्रति के अभाव में कई-कई दिन तक रिहा ही नहीं करता था। प्रधान न्यायाधीश एन.वी. रमण की अध्यक्षता वाली पीठ ने सभी संबंधित पक्षों तक इन आदेशों को ‘तुरंत ही सुरक्षित तरीकेÓ से पहुंचाने के उद्देश्य से हाल ही में एक आदेश में उच्चतम न्यायालय के रजिस्ट्रार जनरल को एक पखवाड़े के भीतर विस्तृत रिपोर्ट पेश करने का निर्देश दिया है। शीर्ष अदालत का प्रयास है कि डिजिटल प्रणाली के माध्यम से न्यायिक आदेश संप्रेषित करने की व्यवस्था पर एक महीने के भीतर ही क्रियान्वयन हो जाए।
इस समय ‘फास्टरÓ (इलेक्ट्रानिक रिकार्ड के त्वरित एवं सुरक्षित संप्रेषण) नाम की नवोन्मेषी योजना पर संबंधित जेलों, जिला अदालतों, उच्च न्यायालय तक न्यायिक आदेशों को पहुंचाने के लिये विचार किया जा रहा है। यह योजना लागू हो जाने के बाद इससे समय की बचत होगी और यह सुनिश्चित होगा कि शीर्ष अदालत के आदेशों के क्रियान्वयन में किसी प्रकार का विलंब हो।
लेकिन इस योजना के अंतर्गत न्यायिक आदेशों को तुरंत ही सुरक्षित तरीके से संबंधित पक्षों तक डिजिटल तरीके से संप्रेषित करने की व्यवस्था सुनिश्चित करने के लिये सभी जेलों में इंटरनेट की सुविधा बेहतर करनी होगी। बेहतर इंटरनेट की सुविधा की आवश्यकता महसूस करते हुए न्यायालय ने सभी राज्यों से जेलों में इस सुविधा की उपलब्धता पर जवाब मांगा है।
इस बीच, सॉलिसिटर जनरल चाहते हैं कि न्यायिक आदेश अदालत की आधिकारिक वेबसाइट पर अपलोड होने के बाद ही जेल अधिकारी उन पर अमल करें क्योंकि कई बार कैदी भी अदालत के आदेश के साथ फर्जीवाड़ा करने का प्रयास करते हैं। नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ आन्दोलन के दौरान हिंसा की घटनाओं के सिलसिले में गिरफ्तार दो छात्राओं नताशा नरवाल और देवांगना कलिता सहित तीन आरोपियों को उच्च न्यायालय से जमानत मिल जाने के बावजूद 48 घंटे तक तिहाड़ से जेल से रिहा नहीं किया गया। दिल्ली पुलिस की ओर से तर्क यह दिया गया कि आरोपियों के निवास स्थान के पते का सत्यापन हो रहा था।
इसी तरह, आपराधिक मामले में आगरा की जेल में 20 साल गुजार चुके 13 कैदियों को अंतरिम जमानत पर रिहा करने के शीर्ष अदालत के आठ जुलाई के आदेश के बावजूद उन्हें एक सप्ताह से ज्यादा समय तक रिहा नहीं किया गया। इलाहाबाद उच्च न्यायालय में 2012 में मामले की सुनवाई के दौरान यह तथ्य सामने आया तो अपराध के समय इन दोषियों की उम्र के निर्धारण का पता लगाने का निर्देश किशोर न्याय बोर्ड को दिया गया था। इसके बाद ही यह पता चला कि अपराध के समय ये कैदी नाबालिग थे। नि:संदेह तुरंत और सुरक्षित तरीके से डिजिटल संप्रेषण की व्यवस्था अमल में आने से कैदियों को राहत मिलेगी और उनके परिजनों को कई-कई दिन तक जेलों के चक्कर नहीं लगाने पड़ेंगे।
